पुणे: चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध मुलशी तालुका में एक तरफ स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मियां तेज हैं, वहीं दूसरी तरफ धान की कटाई का मौसम भी जोरों पर है। इस साल लंबे समय तक चली बारिश के थमने के बाद अब कटाई के काम ने रफ्तार पकड़ ली है।
सभी क्षेत्रों में एक साथ फसल पकने के कारण कटाई का काम एक साथ आ गया है, जिससे मजदूरों की भारी कमी हो गई है। इसके अलावा, किसानों को डर है कि अगर दोबारा बेमौसम बारिश हो गई, तो हाथ में आई फसल बर्बाद हो जाएगी। इसी चिंता में किसान दिन-रात एक करके फसल समेटने की भागदौड़ में लगे हैं।
वन्यजीवों का आतंक और जान का जोखिम
मुळशी तालुका में इन दिनों तेंदुए और अजगर की बढ़ती हलचल चिंता का विषय बनी हुई है। इसके अलावा सांप, बिच्छू और जंगली सूअरों का भी इस इलाके में काफी आतंक है। इसके बावजूद, अपनी मेहनत की फसल को बचाने के लिए किसान अपनी जान की परवाह किए बिना कटाई में व्यस्त हैं।
मशीनीकरण की समस्या और ‘इरजिक’ परंपरा
हालाँकि अब धान काटने की आधुनिक मशीनें आ गई हैं, लेकिन मशीनों से कटाई करने पर पशुओं के लिए जरूरी पुआल (चारा) नहीं मिलता।इस समस्या से निपटने के लिए किसान भाई ‘इरजिक’ (सामुदायिक सहायता) पद्धति का सहारा ले रहे हैं, जिसमें वे एक-दूसरे की बुवाई और कटाई में मुफ्त मदद करते हैं।
रात के अंधेरे में मशाल जलाकर काम
इस क्षेत्र के कई छोटे किसान खेती के साथ-साथ अन्य नौकरी या व्यवसाय भी करते हैं, जिससे उन्हें दिन में समय नहीं मिल पाता। पहले ही बारिश के कारण कटाई में देरी हो चुकी है, इसलिए फसल घर लाने की होड़ मची है। नतीजतन, किसान रात के समय मशालों की रोशनी में अपनी जान जोखिम में डालकर, महिला और पुरुषों के साथ मिलकर कटाई का काम कर रहे हैं।
किसानों की सरकार से मांग
किसानों का कहना है कि दुनिया का पेट भरने वाला ‘अन्नदाता’ अपनी जान हथेली पर रखकर काम कर रहा है, जिसकी बदौलत लोगों को दो वक्त की रोटी मिलती है। सरकार को इस बात का संज्ञान लेते हुए धान कटाई के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि चारे की समस्या भी हल हो और काम भी सुरक्षित तरीके से हो सके।
