8 अरब साल पुरानी आकाशगंगाओं से मिला दुर्लभ रेडियो सिग्नल

पुणे के जीएमआरटी के टेलिस्कोप ने मापी प्राचीन आकाशगंगाओं की परमाणु हाइड्रोजन

पुणे. नारायणगांव के पास खोडद स्थित विश्व प्रसिद्ध ‘जाइंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप’ (जीएमआरटी) की मदद से भारतीय खगोलशास्त्रियों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने लगभग 8 अरब साल पहले अस्तित्व में मौजूद आकाशगंगाओं से निकलने वाले बेहद कमजोर रेडियो सिग्नल (‘एचआई 21 सेमी सिग्नल’) को खोजने में सफलता पाई है। आसमान के ‘कॉसमॉस’ क्षेत्र में किया गया यह अध्ययन शुरुआती ब्रह्मांड में औसतन परमाणु हाइड्रोजन की मात्रा को मापने वाली दुनिया की दूसरी ऐसी खोज बन गई है।

इस महत्वपूर्ण शोध से पिछले 8 अरब वर्षों में ब्रह्मांड में तारों के बनने की गति क्यों धीमी हुई, इस मुश्किल पहेली को सुलझाने में मदद मिलेगी। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स’ में प्रकाशित हुआ है। खगोलशास्त्रियों के अनुसार, ब्रह्मांड के विकास क्रम में तारे आणविक हाइड्रोजन (मॉलिक्यूलर हाइड्रोजन) से बनते हैं और यह आणविक हाइड्रोजन, परमाणु हाइड्रोजन (एटॉमिक हाइड्रोजन) से तैयार होती है। इसीलिए परमाणु हाइड्रोजन को तारे बनने का प्राथमिक ईंधन माना जाता है। ब्रह्मांड के इतिहास में 8 से 10 अरब साल पहले का समय तारे बनने की गतिविधियों का स्वर्ण काल था। हालांकि, उसके बाद तारों के निर्माण की रफ्तार अचानक कम क्यों हो गई, इसे समझने के लिए इन प्राचीन आकाशगंगाओं में हाइड्रोजन की मात्रा का सटीक अनुमान लगाना जरूरी था।

‘आयुका’ (आईयूसीएए) की पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो और इस शोध की प्रमुख लेखिका बलप्रीत कौर ने बताया कि यह सिग्नल बेहद कमजोर होने के कारण इसे खोजना एक बड़ी चुनौती था। ‘जीएमआरटी’ के जरिए कॉसमॉस क्षेत्र का 200 से अधिक घंटों तक अवलोकन किया गया। इसके बाद लगभग 10,000 आकाशगंगाओं के ‘एचआई 21 सेमी’ सिग्नलों को एक साथ मिलाकर आकाशगंगाओं में औसत परमाणु हाइड्रोजन की मात्रा को सटीकता से मापा गया।

एनसीआरए-टीआईएफआर के पूर्व शोधकर्ता आदित्य चौधरी ने स्पष्ट किया कि किसी एक आकाशगंगा से इस सिग्नल को खोजना लगभग असंभव था, इसलिए ‘एचआई 21 सेमी स्टैकिंग’ तकनीक का इस्तेमाल कर कई आकाशगंगाओं के सिग्नलों को आपस में जोड़ा गया।

सह-लेखक प्रो. जयराम चंगलूर और प्रो. निस्सिम काणेकर ने बताया कि लगभग 40 साल पहले जीएमआरटी दूरबीन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ही शुरुआती ब्रह्मांड में हाइड्रोजन की खोज करना था। एक दशक पहले जीएमआरटी के किए गए आधुनिकीकरण के कारण अब कॉसमॉस क्षेत्र की व्यक्तिगत आकाशगंगाओं का अवलोकन करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित हुआ है। शोध से यह भी सामने आया है कि मौजूदा आकाशगंगाओं की तुलना में प्राचीन आकाशगंगाओं में परमाणु गैस की मात्रा और तारे बनने की गति बेहद तेज थी। इन प्राचीन आकाशगंगाओं ने अपने पास मौजूद गैस का बहुत तेजी से इस्तेमाल किया, जिससे आगे चलकर तारे बनाने वाला ईंधन खत्म हो गया और पूरे ब्रह्मांड में नए तारे बनने की रफ्तार धीमी पड़ गई। यह महत्वपूर्ण शोध बलप्रीत कौर (आयुका), प्रो. निस्सिम काणेकर (एनसीआरए-टीआईएफआर), आदित्य चौधरी और प्रो. जयराम एन. चंगलूर (टीआईएफआर) द्वारा किया गया है। भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग और अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन ने इस प्रोजेक्ट में अपना सहयोग दिया है।

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